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♫ गुरु महिमा के भजन ♫ Guru Mahima Bhajan

हद में तो दाता खेल रचायो भजन 

दोहा : हद लखे सो ओलिया, बेहद लखे सो पीर। 
          हद बेहद दोनों लखे, ज्यां रो नाम फ़क़ीर।।

स्थाई : हद में तो दाता खेल रचायो

      बेहद माँहिने आप फिर। 
            अधर धरा पर आसन मांड्यो
            धरा गगन बिच मौज करे हो जी।।  


हंसा होय हंसा संग बैठे,

कागां रे संग नहीं ओ फिरे। 
नुगरा नर तो फिर भटकता
खोजी वे तो खोज करे ओ जी।।


अमर जड़ी गुरुदाता से पाई
नैणां सूं म्हारे नीर पड़े। 

उण बूटी रा परस ना पाया
उण सूं करोडो दूर फिरे हो जी।।


सिमरथ गुरु री शरण में पड़िया

ओघट घाटा गैलां फिरे। 

गुरुज्ञान पारस जिणे पियो वे
विण जीवा ने पार करे हो जी।।


रण चले शूरां रे खाटे
कायर वे तो देख डरे। 

कहे भैरव गुरु दयाल रे शरणे

करोड़ जनम रा पाप ठाले हो जी।।

गुरुदेव दया कर के भजन

गुरुदेव दया कर के, मुझको अपना लेना। 
मै शरण पड़ा तेरी, चरणों में जगह देना।। 

करूणानिधि नाम तेरा, करुणा दिखलाओ तुम। 
सोए हुए भागो को, हे नाथ जगाओ तुम। 
मेरी नाव भंवर डूबे, इसे पार लगा देना।।
तुम सुख के सागर हो, निर्धन के सहारे हो। 
इस तन में समाये हो, मुझे प्राणो से प्यारे हो। 
नित माला जपूं तेरी, दिल से न भुला देना।।

पापी या कपटी हूँ, जैसा भी हूँ तेरा हूँ। 
घर-बार छोड़कर में, जीवन से अकेला हूँ। 
में दुःख का मारा हूँ, मेरे दुखड़े मिटा देना।।
 
मै सबका सेवक हूँ, तेरे चरणों का चेला हूँ। 
हे नाथ भुला ना मुझे, इस जग में अकेला हूँ। 
तेरे दर का भिखारी हूँ, मेरे दोष मिटा देना।।

गुरुदेव दया कर केमुझको अपना लेना। 
मै शरण पड़ा तेरीचरणों में जगह देना।।

सतगुरु सायब जी भजन

सतगुरु सायब जी ओ, म्हारी वीनती सुण लो। 
वीनती सुण लो म्हारी, अर्जी तो सुण लो। 
सतगुरु सायब जी ओ, म्हारी वीनती सुण लो।।

म्हारे तो शत्रु घणा जी, भगती करण दे नाँय। 
काम क्रोध मद डाकन्यां ए, लागी म्हारे लार।।
 
तृष्णा है बल डाकिणी, आ लागी म्हारे लार। 
अजहु तो ए धापी नहीं, खायो जुग संसार।।

शबद स्पर्श और रूप गंध जी, इणमें है वो पाँच। 
अपने अपने स्वाद को जी, जग में भूल्यो जाय।।
 
मन मरकट माने नहीं ओ, कितना करुं रे उपाय। 
बहुत भाँत परमोदियो जी, म्हणे नचावे नाच।।
 
भवसागर का चक्कर में जी, आन पड़ी है नाव। 
करुणा सिन्धु कबीर सा ने, धरमी करे पुकार।।

भली करी गुरुदाता भजन

दोहा : प्रथम गुरु महाराज को तो, चरण निवावूँ शीश। 

हाथ जोड़ विनती करूँ, गुरु ज्ञान करो बख्शीस।।

स्थाई : भली करी गुरुदाता, जिव राख्यो चौरासी में जाता। 

भूलूं नहीं लाखो बाता, म्हारे गुरु वचनो रा नाता।।


करम गली में आयो, करमां में काठो कलायो। 

गुरु बचा लियो दोनूं हाथांम्हारे गुरु वचनो रा नाता।।


पगां तणो पांगलियो, म्हारा सतगुरु हेलो सांभळियो। 
नहीं तो रन वन में रह जाताम्हारे गुरु वचनो रा नाता।।


आँख्यां छतो अंधारो, गुरु भूण्डो हाल हमारो। 

सत्संग रा खेल बतायाम्हारे गुरु वचनो रा नाता।।


मोह माया री नदी है भारी, जिण में बह गयो कई वारि। 

गुरु बचा लियो बह जाता, म्हारे गुरु वचनो रा नाता।।


सतगुरु सेण बताई, साधु सिमरथ राम सुधि पाई। 

गुरु चरणों में राता माताम्हारे गुरु वचनो रा नाता।।

म्हारा मन, सतगुरु दरश दिखावे भजन

दोहा : तीरथ गये ते एक फल, संत मिले फल चार। 
           सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार।।


स्थाई : प्राण पड़े म्हारी काया धूजे, नैणा में नींद नहीं आवे रे। 

            म्हारा मन, सतगुरु दरश दिखावे।।


खान पान म्हने फीका लागे, जिवडो म्हारो कुम्हलावे। 
कद सतगुरुजी दरश दिखावे, मन री प्यास बुझावे रे,

म्हारा मन, सतगुरु दरश दिखावे।।


तन मन धन करूँ रे निछावर, फुलड़ा री सेज बिचावूं। 

भाव प्रीत रा तकिया लगावूं, सतगुरु चवर ढुलावू रे,
म्हारा मन, सतगुरु दरश दिखावे।।
 
सतगुरु आवे ज्यां रा दर्शण पावुँ, मोतियाँ रा चौक पुरावूँ। 
ले गंगाजल चरण पखारूँ, हरख-हरख गुण गाऊँ रे,
म्हारा मन, सतगुरु दरश दिखावे।।
 
जनम-मरण रा बंधन तोड़े, सतगुरु आंगण आवे। 
दे चिंगारी अमर किया म्हाने, नाथ गोरख जस गावे रे,
म्हारा मन, सतगुरु दरश दिखावे।।


हंस हीरा रो मोल करे भजन
 
दोहा : गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है, घडि-घड़ि काढ़े खोट। 
          भीतर हाथ पसार के, बाहर मारे चोट।।
 

स्थाई : गुरु म्हारा पारस पवन सूं ही झीना,

            शायर वाली दाता लहरा करे। 
            हंसला री गुरुगम हंसलो ही जीणे,
            हंस हीरा रा मोल करे हो जी।।

 

गुरु म्हारा पारस पत्थर ने पूजे,
पारस संग ले पत्थर तिरे। 
पत्थर तिरेओ वाने प्रेमजाल पावे,
पारस पेले पार करे, हो जी।। 

गुरु म्हारा पारस बलध ने हाँके,
सत शब्दो वाली हाँक करे।
ज्ञान की डोरी ने प्रेम अगाडी,
हलकारे ज्यूं शाम ढले, हो जी।।  
 
गुरु म्हारा पारस हेत वाला हीरा
हंस मिल्यां दाता हेत करे। 
हंसा रे जोड़े बैठे कागला
कागा ने दाता हंस करे, हो जी।।
 
बादली ज्यूं बरसे ने बिजली ज्यूं चमके,
झर-झर झरना नीर बहे। 
नीर झरे वठे निपजण लागा,
पीया प्याला मगन फिरे हो जी।।
 
गुरु म्हारा शायर समद जल सागर,
महासागर में जहाज तिरे। 
नुगरा वे तो गलस्यां ही खावे,
समइयां पहला पार करे, ओ जी।।
 

निर्गुनाथ भोलानाथ जी जाण्यां,

दुर्बल ऊपर दया करे। 
भवानीनाथ यूं जश गावे,
आप गुरांसा ने याद करेहो जी।।  

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